फ़िकर ऐ यार की लंबी रातें , बड़ी उदास
शामें ,
अब बस भी कर दिसंबर , क्या मार
ही डालेगा .....!!
Khamosh bethe hain to log kehte hain udaasi acchi nahi...
Zara sa hans lein to log muskurane ki wajah pooch lete hai . . .
जितना दूर रहो उतना अच्छा है तुझसे,
दिल को भी समझना है तुझे भी किसी और के संग जाना है...
मैं फ़ना हो गया ...लेकिन वो जरा भी
नहीं बदली .....
मेरी चाहतों से भी सच्ची
रही नफरत उसकी।
खुले थे दिल के दरवाज़े.....
उसमे से मेरी मोहब्बत भी
चली गयी....
मेरे पास ही था..उनके ज़ख्मों का मरहम......
मगर बड़े शहरों में कहाँ छोटी दुकान दिखाई
देती है.....
कितनी जल्दी ज़िन्दगी गुज़र जाती है,
प्यास भुझ्ती नहीं बरसात चली जाती है,
तेरी याद कुछ इस तरह आती है,
नींद आती नहीं मगर रात गुज़र जाती है."
सर्द ठिठुरी हुई लिपटी हुई सरसर की तरह
ज़िंदगी मुझ से मिली पिछले दिसम्बर की तरह............
चवन्नी की कुल्फियों में शहंशाह हुआ करते थे,
आज हजार के नोटों ने परेशान कर दिया...!!
हमको भी कहाँ आती थी शायरी
तेरी आँखों के शिकार हैं बस तब से बीमार हैं
बरसों बाद जब मिले तो वो ऐसे रो पड़े,
जैसे आज भी कितने अधूरे है वो मेरे बिना !!
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