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"मैं हाथ थाम सकूँ उसका...
मुझ पे इतनी इबादत सी कर दे...
वो रह ना पाऐ मेरे बिना ऐ खुदा...
तू उसको मेरी आदत सी कर दे "
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ना जाने क्या, मेरी इस जिंदगी का मनसुबा है...!!
तमाम उम्र ये दिल मेरा बेचैनियो मे डूबा है..!!
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ले लो वापस वो आँसू वो तड़प वो यादें सारी
नहीं कोई जुर्म हमारा तो फिर ये सजाएं कैसी..!!
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"कर लेता हूँ बर्दाश्त हर दर्द इसी आस के साथ..
की खुदा नूर भी बरसाता है ... आज़माइशों के बाद".!!!
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तुमने अपने होंठो से छुई थी ये पलके
नींद के मुकद्दर में ख्वाव लौट आये थे
रंग ढूँढने निकले थे लोग कबीले के
तितलियों ने मीलों तक रास्ते दिखाये थे
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ख़ुदा तूने तो लाखों की तकदीर संवारी है, मुझे दिलासा तो दे, के अबके मेरी बारी है..
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वैसे तो कोई बुरी आदत नहीं हमें....!! बस आपको याद करने की थोड़ी लत लग गई है...!!
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मैंने तो हमेशा तुम्हे मोहब्बत ही की है..
तेरे ना मानने से हक़ीक़त नही बदलेगी..
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मेरे लफ्ज़ फ़ीके पड़ गए तेरी एक अदा के सामने.. मैं तुझे_ख़ुदा कह गया अपने_ख़ुदा के सामने...
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इश्क़ सभी को जीना सिखा देता है,
वफ़ा के नाम पर मरना सीखा देता है,
इश्क़ नहीं किया तो करके देखो,
ज़ालिम हर दर्द सहना सीखा देता है !!
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जरुरी तो नहीं था हर चाहत का मतलब इश्क हो, कभी कभी कुछ अनजान रिश्तो के लिए भी दिल बेचेंन हो जाता है..
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पास आकर सभी दूर चले जाते हैं, हम अकेले थे अकेले ही रह जाते हैं, दिल का दर्द किससे दिखाए, मरहम लगाने वाले ही ज़ख़्म दे जाते हैं.
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तुम मुझे मुस्कुरा के कह दो की तुम मुझे भुल जाओ....
क्योंकि तेरी खामोशी मुझे भूलने नहीं देगी .....
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मुझे भी समझा दे अपनी मज़बुरीयां इस कदर....
की भुल जाऊ मै भी तुझे उन मज़बुरीयो के खातिर ....
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लौट आऔ ना एक बार फिर उसी तरह...
जिस तरह मूवी आती है अपने नाम के पीछे रिटर्न्स लगाकर..
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कभी सोचा ना था...
इतना सोचेंगे तुम को ...
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मैं ख़्वाब देखना छोड़ रहा हूँ.....
ख़ैर
तू हक़ीक़त हो....
तो लौट आना एक दिन ।।
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न चाहत के अंदाज़ अलग न दिल के जज़्बात अलग।
थी सारी बात लकीरों की....तेरे हाथ अलग... मेरे हाथ अलग।
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.मेरे हाथों में उनका हाथ आया तो महसूस हुआ.....
ज़िंदगी ही हाथ लग गई हो जैसे.....
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रिश्तों को सम्भालते सम्भालते थकान सी होने लगी है...
रोज़ कोई ना कोई नाराज हो जाता है....✍
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