▶एक उस्ताद था वो अक्सर अपने शार्गिदों से कहा करता था कि दीने इस्लाम बड़ा क़ीमती है।
एक रोज़ एक तालिब-ए-इल्म का जूता फट गया। वो मोची के पास गया और कहा: मेरा जूता मरम्मत कर दो। उसके बदले में , मैं तुम्हें दीने इस्लाम का एक मस्अला बताऊंगा।
मोची ने कहा: अपना मस्अला रख अपने पास। मुझे पैसे दे।
तालिब-ए-इल्म ने कहा: मेरे पास पैसे तो नहीं हैं।
मोची किसी सूरत ना माना। और बगैर पैसे के जूता मरम्मत ना किया।
तालिब-ए-इल्म अपने उस्ताद के पास गया और सारा वाक़िया सुना कर कहा: लोगों के नज़दीक दीन की क़ीमत कुछ भी नहीं।
▶उस्ताद भी अक़लमंद थे: तालिब-ए-इल्म से कहा:
अच्छा तुम ऐसा करो: मैं तुम्हें एक मोती देता हूँ तुम
सब्ज़ी मंडी जा कर इसकी क़ीमत मालूम करो।
वो तालिब-ए-इल्म मोती लेकर सब्ज़ी मंडी पहुंचा
और एक सब्ज़ी फ़रोश से कहा: इस मोती की क़ीमत
लगाओ।
उसने कहा कि तुम इसके बदले यहाँ से दो तीन नींबू उठा लो। इस मोती से मेरे बच्चे खेलेंगे।
वो बच्चा उस्ताद के पास आया और कहा: इस मोती की क़ीमत दो या तीन नींबू है।
▶उस्ताद ने कहा: अच्छा अब तुम इसकी क़ीमत सुनार से मालूम करो।
वो गया और पहली ही दुकान पर जब उसने मोती दिखाया तो दुकानदार हैरान रह गया।
उसने कहा: अगर तुम मेरी पूरी दुकान भी ले लो तो
भी इस मोती की क़ीमत पूरी ना होगी।
तालिब-ए-इल्म ने अपने उस्ताद के पास आकर माजरा सुनाया। उस्ताद ने कहा:
बच्चे! हर चीज़ की क़ीमत उसकी मंडी में लगती है।
▶दीने इस्लाम की क़ीमत अल्लाह वालों की मंडी में लगती है। उस की
क़ीमत को अहल-ए-इल्म ही समझते हैं।
जाहिल क्या जाने दीने इस्लाम की क़ीमत को।।।
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▶बे शक: यही वजह है कि लोग आलिमे दीन को रास्ते में खडा रख कर मस्अला पूछते हैं
और वकील की सलाह ओफीस में जाकर लेते हैं
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