मन्ज़र भी मुसलमां, पसे मंज़र भी मुसलमान
गर्दन भी मुसलमान है, ख़ंजर भी मुसलमान
क्या गुज़रेगी इस्लाम की कश्ती पे ख़ुदारा
तूफां भी मुसलमान है लंगर भी मुसलमान
कल बेहतर ओ बेहतर से भी बेहतर था मुसलमान
अब बदतर ओ बदतर से है बदतर भी मुसलमान
सर काटने वाले को भी है दावा-ए-इस्लाम
कटते हैं जो हर रोज़ वो हैं सर भी मुसलमान
कल आस था उम्मीद था ख़तरा न था कोई
अब सारे ज़माने के लिए डर भी मुसलमान
तारीख़ है शाहिद कि बड़ा फ़र्क़ था उन में
लाखों भी मुसलमां थे बहत्तर भी मुसलमान
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