अब काम दुआआों के सहारे नहीं चलते,
चाबी न भरी हो तो खिलौने नहीं चलते ।
अब खेल के मैदान से लौटो मेरे बच्चो,
ता उम्र बुज़ुर्गों के असासे नहीं चलते ।
इक उम्र के बिछुड़ों का पता पूछ रहे हो ,
दो रोज़ यहाँ ख़ून के रिश्ते नहीं चलते ।
ग़ीबत में निकल जाते हैं तफ़रीह के लम्हे ,
अब महफ़िले-याराँ में लतीफ़े नहीं चलते ।
यह विल्स का पैकेट,ये सफ़ारी ,ये नगीने ,
हुजरो में मेरे भाई ये नक़्शे नहीं चलते ।
लिखने के लिये क़ौम का दुख-दर्द बहुत है,
अब शेर में महबूब के नख़रे नहीं चलते ।
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