मुसलमाँ हूँ मैं, मुस्लिम होने की पहचान से जाऊँ,
जो आतंकवाद का दूँ साथ तो ईमान से जाऊँ,
सिखाता कब है ये मज़हब, मिलेगी इस तरह ज़न्नत,
वो अपनी जान से जाये मैं अपनी जान से जाऊँ,
इज़ाज़त ही नहीं नाहक किसी का खूँ बहाने की,
भला ऐसा अमल करके मैं क्यों कुरआन से जाऊँ,
पड़ोसी गैर मुस्लिम है फिर भी वो मेरे भाई के जैसा है,
तो मैं क्यों छोड़कर फिर ऐसे हिंदुस्तान से जाऊँ,
मेरे हिस्से की रोटी भी खिला दूँगा उसी को मैं,
न होगा मुझसे, मैं मुँह फेरकर, मेहमान से जाऊँ,
मैं जिस महफ़िल में आया हूँ यही अरमान है मेरा,
मैं जितनी शान से आया था उतनी शान से जाऊँ.....
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