बोल रहा कैराना है.......!
रफ़्ता रफ़्ता अपने लबों
को खोल रहा कैराना है ।
चंद भेडिये नाम पे मेरे
अपनी रोटी सेंक रहे,
नये शिगूफे ले आये
जुमलों पर जुमले फेंक रहे !
इक दंगाई फिर से यात्राओं
का नाटक खेल रहा,
और लखनऊ वाले सब
चुपचाप तमाशा देख रहे !
नफरत के तूफान में फंसकर
डोल रहा कैराना है ।
बोल रहा कैराना है.......!
मुझे जो नफरत की तहरीर
बताने पर आमादा हैं,
और द्रौपदी वाला चीर
बताने पर आमादा हैं !
वो जो सियाही और लहू
का फर्क़ भुलाये बैठे हैं,
वो कैराना को कश्मीर
बताने पर आमादा हैं !
उन्हे बता दो सदियों से
अनमोल रहा कैराना है ।
बोल रहा कैराना है........!
'मन की बात' करो तो भूखे-नंगों
की भी बात करो
भगवा रंग के साथ और सब
रंगों की भी बात करो
दो सालों में ख़ून-ख़राबा,लफ़्फ़ाज़ी
ही लफ़्फ़ाज़ी
'चाय पे चर्चा' करने वाले दंगों
की भी बात करो !
तुम कहते हो ज़हर फ़ज़ॉं में घोल
रहा कैराना है ।
तो फिर सुन लो आज चीख़
कर बोल रहा कैराना है !
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